Tuesday, September 19, 2017

रातो की बात : अध्याय ४


(डस्क ऑफ़ डौन )(भाग ३)
नौकरी के अगले पड़ाव में कुछ दिन तुम्हारे सहर में रहने को मिला , वहां तुमसे एक दो मुल्लाकात और उस दोरान हुई हलकी फुलकी बातो की यादें लिय वापस आपने सहर आया | काम की आपाधापी और रफ़्तार ने कुछ अल्पविराम लगे संवादों को हवा देने की कोसिस फिर एक बार सुरु की है| इस बार तुम्हारा ट्रान्सफर मेरे सहर हुवा वो भी कंक्रीट क जंगलो में उसी जगह जहाँ मेरे ऑफिस का पता था अंतर सिर्फ इतना तुम्हारी 10th फ्लोर मेरा 9 यहाँ भी तुम हमसे उपर | ये बात भी तब पता चली जब रात क ओवरटाइम क बाद कुछ देर सोचा ऑफिस क अस पास टहल लेते है मुलाकात एक बार फिर हमारी तरफ बढती तुमसे फिर हो गई,
वो : लगता है दिन का काम खत्तम नहीं हो पाता य इतना काम है दिन में खत्तम नहीं हो पता ?
मैं:-दोनों बाते साथ भी हो सकती है मगर फिलहाल आइये चाय हो जाये ?
वो :-क्यों, लगता है ऑफिस क बाद चाय की दुक्कन पर सेकंड शिफ्ट हो रही ,
इतनी सी बातो क दौर के बाद हम फिर चाय की टफ्ली की और थे कुछ देर साथ रहे और वही से पता चला वो अब साथ काम करेंगी "अपने सहर में" |
आलम अब ये था की जहाँ मैं हफ्ते के पञ्च दिन ऑफिस के एम्प्लोयी रिटायरिंग रूम को आपना कमरा बना रखता था, दिन-रात जहाँ सिर्फ मैं रहा करता था, जिस कमरे का नाम अब "मोहित सर का रूम " हो गया था उसे अब शिफ्ट करने का वक्त आगया था | मैंने जिंदगी में शायद इन 10 सालो में पहली बार शिफ्ट रूटीन अपनाइ थी ,मेरे लिय भी नया था और मेरे साथियों के लिय भी|
बॉस ने युही पूछ लिया : सब ठीक तो है !
मैं:-हमने कहा पहले काम तो था वजह नहीं अब काम तो है ही शायद वजह अब मिल गई |

Friday, September 15, 2017

रातो की बात : अध्याय ४

रातो की बात : अध्याय ४
(डस्क ऑफ़ डौन )
बहुत दिनों के बाद आज तुम्हारे सहर में था कुछ दिनों का काम जो है , मगर इस काम के बीच भी तुमसे मिलने की चाहत दिल में कही बार बार सिर्फ तुम्हारे घर के रास्ते हि काम की मंजिल तक पहुँचा राहि थी फिर भी तुमसे मिलने का वक्त नहीं मिला | बता सिर्फ इस लिये रहा हूँ क्यूंकि कल वक्त तो होगा मगर हम यहाँ न होंगे | आज का काम किस्सी मौके की तरह था जहाँ हम आज फिर हार गए | जानता हूँ की अब रोज बात भी लम्बीनहीं होती हर दिन ,मगर सुकून तो है की शायद कल थोड़ी लम्बी बात होगी , तुम्हारी समझदारी का कायल हूँ , अब तो जब बुख का एहसास भी तुम्हारे याद दिलाने पर हि होता है , अपने दिल को आज सक्त करे के मेरा कल सवार रही हो | और में तुम्हारे हक का वक्त भी आज तुम्हे नहीं दे पाया |

Sunday, September 10, 2017

बस एक शाम

लगता है रात और उसका मेरे साथ कुछ ज्यादा ही बेहतर होता जा रहा है | जहाँ एक ओर आज की रात में ख़ामोशी की कमी है , वही आज तेज हवाएँ अपना मधुर संगीत गा रही थी | आज चांदनी चादर तो थी मगर झिलमिलाते तारे  नदारत | आप को छू कर गुज़रती यें हवाएं आपको किसी ख्वाब में ले जाने को आतुर थी ,  पर शायद आज मेरा साथ निभाने को सिर्फ बादल थे | मन तो करता है कुछ नया लिखू पर मेरा और इस रात क साथ ..एक अलग अंदाज है...मेरी जिंदगी में सबसे ज्यादा रात की कशिश है ......... यादों के गलियारों में टहलते हुए यूँ ही एक शाम की बात थी जो सामने से गुज़रे तो ज़माना हो गया पर अब भी उस शाम के बारे में सोचता हूँ तो दिल को हमेशा सुकून ही मिलता है........एक सुस्ताई शाम में , जब घर लौटा और आराम कुर्सी पर आकर बैठा ही था और चाय की तलब जाग ही रही थी की उन्होंने चाय की प्लेट सामने रख कर चुपचाप साथ में आकर बैठ गई  और बस हम एक दूसरे को निहार रहे थे , उनकी आँखे शायद अब भी नम थी और मेरा दिल उन्हें यूँ देख कर बोझिल...... तभी उनकी ख़ामोशी टूटी..... और धीमे से बोली :- “जानते हो मैं आप से शिकायत नहीं कर रही पर आपको कभी याद नहीं रहता और हर वक़्त आप हमे अकेला छोड़ कर चले जाते है......आपका फ़ोन भी नहीं लगता...... आज पूरे दिन आपका फ़ोन कितनी बार लगाया पर आप न जानें कहाँ बिजी थे........आप सुबह मेरे से नाराज हो कर भी चले गये थे , कितना समझाना चाहती थी आपको पर आप .........." और आगे के अल्फाज़ो को उनके आँखों से बहती धारा ने समेत लिया और वो शब्द कहीं डूब गये  और उनकी आँखों से कुछ बह गया... हम अपनी कुर्सी से खड़े होकर उनके पास आये और उनके गुमसुम चेहरे पर बनी लकीरो को पोछा और अपने चेहरे पर हलकी मुस्कान लेकर उनसे बोले “आप की तबियत नहीं सही थी तो सोचा आज की चाय हम बना ले… आप ने कल भी नहीं बताया की आपको कमज़ोरी है...और एक दिन बिना उठाये आपको अगर खुद चाय बना लिया तो क्या आफ़त आ गई .....और ऑफिस में आज इंस्पेक्शन की वजह से बिजी था और फ़ोन डिस्चार्ज. ...और जब खाली हुआ तो सीधे आपके पास आ गया.......माफ़ी मुझे मांगनी चाहिए आपसे ” उनके लिए साथ लाई दवा उनके हाथों में रखा..... और उनको बांहो में भरा........”आप जिंदगी का जरुरी हिस्सा हैं और आप ही  याददाश्त हैं हमारी..आपके बिना दिन की शुरुवात हमारी हो ही नहीं सकती ये तो आप भी जानती है.... आपको अकेला नहीं छोड़ा था ना ही नाराज़ था.... जल्दी थी बस , आपके लिये नोट तो फ्रिज पर रखा था......और आपकी ख़ामोशी हमारी जान ले लेगी अब थोड़ा मुस्करा भी दे “ उस वक़्त आई उनकी चेहरे पर वो ख़ुशी आज भी याद आती है जब आज वो हमसे युही मुस्कुरा कर हर शाम मिलती है , अजीब है यूँ एक दूसरे का ख्याल रखना बिना कहे मगर शायद यही प्यार है……………………..

सच

डायरेक्ट दिल से में बहुत दिनों से कुछ खास लिखा नहीं , शायद दिल कुछ कहना हि नहीं चाहता था , मगर फिर भी कुछ सोच के दिल की बात मान कर अपने पुराने आधे अधूरे ख्वाबो में  लौट चलने को बेक़रार दिल ने आज फिर कलम को साथी बना हि लिया . जरुरी उम्र में गैर जरुरी चेजो के पीछे भागता रहा और हर बार नए सपनो की  आस में खुद को हि दोखा देता  रहा |
उम्र थी तब, जब ,ख्वाब नए थे ,जोश उमंग तरो ताज़ा ,फिर न जाने क्यों अपने हि सपनो को समय नहीं दे पाया , कुछ न जान पाया न समझ पाया , अब जब उम्र भी नहीं है जोश भी नहीं है | शायद य कभी समझ हि नहीं पाया की “ मैं चाहता क्या था खुद से ? शायद वो तो नहीं जो अब हूँ न आपने घर वालो की उम्मीद से ,न हि वो हूँ जो कभी बन सकता था | फिर सोचा की चलो जब सब हार हि चूका हूँ तो खोने को अब बचा हि क्या? अब खुद को बहुत सी चीजों से अलग कर रहा हूँ , सच य भी है की अकेले में कुछ कर भी नहीं सकता मगर अब परवाह नहीं | एक अलग पहचान बनाने की कोसिस को शायद अकेले  संघर्ष की जरुवत है, इस नई सुरुवात की कीमत शायद  कई पुराने किनारों के अंत भी है |
अगर मैं खुद क लिय कुछ नहीं कर सकता तो खुद से औरो को क्या उम्मीद रखने दूँ | मैं आपने लिय जीता रहा और यही सोचता रहा की सब यही चाहते है , आपने फैसलों को उनका समझ क पूरा करता रहा मगर य न कल सच था न आज | बहुत कुछ सिखा रही है जिंदगी , बैमानी जगह आपना वक्त बर्बाद करता रहा ताजुब की बात है की य जानते हुए भी की वक्त की बर्बादी है मैं वही करता रहा , खुद को रोक नहीं पाया |

हर बार नए सिरे से सुरुवात करता हूँ और नए सिरे से गर्दिश से गिरता हूँ , शायद कभी चलना सिखा हि नहीं और बातों में ऊँची उड़ान भरता रहा , लोगो को लगता है किस्मत ने साथ नहीं दिया मगर क्या कभी मैंने किस्मत को मजबूर किया साथ चलने को ? मेरा साथ से किस्मत अभी तक ऐस्सा कुछ किया हि क्या है |

Sunday, August 27, 2017

वजह लिखने की

कई बार मेरे से लोग पूछते है आखिर तुम जो लिखते हो उसकी वजह क्या है? कहाँ से चुराकर लिखते हो ? कई बार जब लिखना शुरु करता हूँ तो लोगो को उसका सारांश समझ नहीं आता ? इन सब सवालो के जवाब में केवल एक ही बात कह सकता हूँ ,में लिखता हूँ क्यूंकि मुझे इसकी जरुवत है | मैं वह सब लिख कर कागज पर उतार देना चाहता हूँ, जो मेरे मन में चलता रहता है , जिसकी मुझे परवाह भी नहीं करनी  पड़ती  | मैंने कभी कोई अपना सपना या कोई ऐसी बात नहीं लिखी जिनसे में कभी रु-बा-रु ना हुवा हूँ  , मेरे अपने तजुर्बे को कागज पर उकेरा है , अच्छे बुरे जेसे भी थे वो मेरे अपने थे | जब भी लिखता हूँ तो इस सजीव दुनिया में “मैं” अपनी बात कम से कम खुद से तो कह पता हूँ  , थोडा इसी बहाने अपने आप को आपने जज्बातों से अलग कर के वास्तविकता समझने की कोशिस भी कर लेता हूँ  क्यूंकि कही पढ़ा था “जीवन का दर्द  इस संसार का सबसे बड़ा उपहास है और सीख उसकी इनाम” | मेरी लिखने की एक वजह शायद ये भी है कि इस दुनिया में “मैं” ही ऐस्सा व्यक्ति हूँ जिसकी बात दुनिया को अगर बताऊ तो “वो” मुझसे बुरा नहीं मानेगा |
 

Friday, August 25, 2017

sararah

बहुत दिनों से सरारह के बारे में सोच रहा था, ये एक सोच तो सही थी की जिनको अगर कुछ भी कहना हो तो बिना डरे कह सकते है और सामने वाले का रिएक्शन भी जान सकते है | खास बात ये थी कि आपकी पहचान दुनिया से छुपी रहती है | फिर ये लगा की क्या फर्क पड़ता है क्यूंकि बहुत से लोग इसको मजाक एंड प्रैंक्स क लिय इस्तेमाल कर रहे है, चलो आज डायरेक्ट दिल से में सरारह कि आड़ लिये बिना कुछ बाते कबूल करता हूँ और उम्मीद करता हूँ कि जो भी रिएक्शन हो वो पता जरुर चले |

कल जब कानपूर में था तो पुराने दिन और उनसे जुड़ी यादे जेहन में चल रही थी...... हर चीज़ जो सामने पड़ती उसकी पुरानी धुंधली तस्वीर सामने होती....नए पुराने के बीच आते जाते विचार और उन सब में डूबा हुवा मैं .... मानो सारी थकान मेरे से जुदा होकर नयी सोच क साथ हो चली थी........ झकरकट्टी आज भी वैसा था जैसा ६ साल पहले.......ट्रैन क सफर छोड़ क मैंने बस चुना क्यूंकि वो पुराने नज़ारे इतने आम नहीं मेरे लिए...... कई सालो के बाद वो सफर कानपूर से इलाहबाद मज़ा आगया..... वही डिफेन्स कॉलोनी क्रासिंग का जाम और नया बनता फ्लाई ओवर.... रमा देवी की अलग पहचान....थकान जब तक पूरी तरह से हावी होती में चुडगरा तक आ गया था.... इस बीच रस्ते की हर चीज़ अलग ही थी कुछ नये और पुराने कहीं कुछ निगाहो को पहचान बताता तो कुछ अपने नये होने की बात करता , जो भी था वो एह्साह कमाल का था | आज भी रावतपुर क्रासिंग की शान रेव  मोती.... वो तो यार अल्टीमेट था.. बस वक़्त थोड़ा कम था वरना सब कुछ एक बार फिर जीता... यूँ तो एक साल पहले भी कानपूर में ही था पर इस बार सिर्फ पुराने दिन क लिए यहाँ था वो पल जब पहली बार घर से निकला था... वो पल जब तक हार कर नई सोच क साथ में ही बदल गया, वो आज का मोहित नहीं पुराना वाला था जो कल जिन्दा हो कर , एक पूरा दिन जिया .न कोई फ़ोन न कोई टेंशन ...... बस खुले अस्समान क निचे बहती हवाओ क साथ पुराना  याराना .......वो कुछ घंटे क वक़्त ने जाता दिया हमको हम..... क्या से क्या हो गये कल और आज में कितना बदल गये ना जाने कितने आपने इन रास्तो में अलग हो गये जिनका साथ मायने रखता था ?
 

Wednesday, August 23, 2017

Direct Dil Se

It's all about "What you achieve in life ?" No maters your worth yesterday but what yours worth in present and future growth even having your darkest past ,all you have to worry about the hard work and energy you put in your work with dedications . Parameters may be anything but at least you had your faith in yourself alive backing up to upfront once more to face devil face of reality. life was never an evil but was "Expectations unquenched."

Sunday, August 20, 2017

mein

मैं बहुत दिनों से ये समझने की कोसिस कर रहा था और प्रामाणिक तौर पर अपनी ही बातो को रिकॉर्ड करते जा रहा था जैसा की आज भी मैंने किया , में दार्शनिक तौर पे बहुत से लोगो की बहुत सी गलतियों को नोटिफीय तो कर ही रहा था साथ ही इस बात को नज़र अंदाज़ भी की शायद में उन लोगो जैसा शायद बन भी नहीं पाउँगा , सभी लोगो की खासियतें अलग अलग होती है साथी उनकी कमिया भी , बात तो तब है जब किसी की कमिया आप बताय तो मगर उस गलती को खुद भी न दोहराहे में पिछले कुछ हफ्ते से कई चीज़ो खुद को अलग करने की नाकाम कोसिस करता रहा हूँ और य तो जान ही गया हूँ में खुद को जिस आईने में देखना चाहता हूँ उसको तराशना मेरे को ही है उम्र हो चुकी की अब्ब गलतियों की जुंजाईश कम की जाय

Saturday, August 19, 2017

purvanuman

खोजी लोगो की तमाम खासियतों में एक यह भी है कि वो संदेह बहुत करते है ऐसे कि उनको हर जगह उसके होने कि वजह और उससे होने वाले परिणामो कि चिंता रहती है , रचनात्मक होने क लिए किसी स्कूल या यूनिवर्सिटी कि जररूत नहीं होती , सिर्फ खुद को समझने और अहंकार को ख़तम करने कि जरूरत है , अंहकार के कई स्वरूपों में एक , मैँ सब जनता हूँ और आगे ऐसा ही होगा क्यूंकि अभी तक ऐसा ही होते आया है , इन सब को भूल कर ही हम आगे बढ़ सकते है अपने पूर्वानुमानो को ज ब तक जांच न ले किसी तर्क को उसका अंजाम नहीं माने

Monday, August 7, 2017

All other festivals may be very colourful but no festival is as powerful as Raksha Bandhan. It makes our bond stronger and stronger. Happy Raksha Bandhan!

Saturday, August 5, 2017

मुकाम

अभी तक थोडा ही खुद को समझ पा रहा हूँ, जरुरी चीजों को दर किनार कर बहुत सी गैर जरुरी चीजों का दिमाग में समायोजन होता जा रहा , उम्र आपनी ही रफ़्तार में बढ़ रही जिंदगी कम हो रही , मगर असल परेशानी का सबक उम्र या जिंदगी नहीं वो सारे मुकाम है जो आपने हो सकते थे मगर हमने उनको निकल जाने दिया, बहुत से लोग  कहते है जिंदगी में मौके बहुत मिलते है मगर मेहनत करने वालो को , अब सवाल ये है की हम पीछे कहा रह जाते है इन दोनों में ?

जिंदगी में सवालो के ढेर होते जा रहे और उनके जवाब नाकाफ़ी | मुक्कमल जिंदगी हो ना हो एक मुक्कमल कल आने वाले कल के नाम जरुर हो | हताशा ने अभी सिर्फ दस्तक दी उसको अभी भी घर के अंन्दर आने नहीं दिया देखते है किसकी जिद बड़ी है हताशा जो अंदर आना चाहती है या में जो बाधा बन उसके रस्ते अभी भी खड़ा हूँ|

Wednesday, August 2, 2017

Story never been told.

Fear is the most un-predective and common experiences of once life. Actually, man fear from things that in reality are not so screamy and fearful as once own conscious made the facts in subconscious to suit in the situation and make it more worst. Fear is to face the situation and work, which may be because of the reason, negativity present in our own minds we never wanted to come out from our comfort zone of living due to which the deep sowed seed of fear in our subconscious mind starts growing with our age without being generally noticed.

This is the story, where one is considered to be fearless strong tough in the circumstances of life but actually does everyone has overcome his or her fear? This is the story of the person who had lived his life under his choices but in the lights of his parents. Story starts when I first saw her. She was topper of our class most beautiful innocent smile I was with. She was on the count of 9.8 out of 10 in the eyes of every person in our school and the all-rounder whenever any extracurricular or other activity were organized there where the fight between rest of the positions except first…after all, this position was patent for her. I was in the same school in which my sisters had their schooling too and they were among the toppers and all teachers were expecting me to produce and repeat what the benchmarks of my sisters had produced but I was different from them every single individual is different from others but our society is one which never see the potentials but they are programmed to judge the others on count of what they want to make and see others. My starting was in just as all other but I recognized in early age to break the trend and known as by my name just AS RUDRA… whose funda of life is to live in full throttle mood. Never had fear of what comes to next, a total headache and for some stupid idiot freak who never had been in the serious talks although the short tempered. Two opposite qualities residing beneath the behavior of mine. When she came across my life and we had some conversation going on… I just realize that something was in her that make me complete while as a good friend she always knew what I was upto on any situations. She being the nicest girl I would have ever known in any part of my life. She exactly know what she need when and how also along with the fact where I suits in. School days are always adorable but for me it was nothing more than the passing days.  

Lame memory Lane

after a whole long time i opened a photo album of mine , pics contained all the good times just paused and giving a hope to rewind the memory lane once again go wild. i was amazed to see what we have lived in past the joy happiness of being togetherness but still they were only stills of pasts never to be again as it was ever, only the hope to create the similar acts but never the same. While in many seen a pic of yours again but noting new came in mind as that there was nothing after all.

Monday, July 31, 2017

chapter 1

Things i learned from the past i lived made me think about how one can be so brutal to its own kind , humanity is not seen but donation in name of charity is new cult of society where in the name of humbleness and corporate social responsibility creates a new way of generating wealth and yet our society remains in disguise  and we are poor.
we may have earned wealth but still the mindset of society  is that we can't understand if monetary view is absent.i remember the times when we use to ride the bi-cycles end explore the country side but today i even don't have time to see the plants in our own garden of place called ''home''.
rudra

Sunday, July 30, 2017

Chapter 5 Violent apology

Pushpendra mishra (PM).YAAR my worst thing in my life I had experienced now...
Guru Maan (gm)... ki gal kar raha kake... ki huwa abb....
Pm. Yaar abb wo mere ko meri aukkat bataiygi... saleke se sorry bola.... wo sb kitta ..janu assi kabhi na kithe the....
Gm..... oy laala duniya ko aukkat bata na ... dikha .
Pm.. saccchi gal dasso kake.... apni hi matt mari gai thi ...sala abb kuch bhi karlo... nasoor bn gai hai y.... pause of silence
Gm.... baat puri to kar mitra...
Pm..... dekh bhau... tu to sb janaya hai... kya kiya kyu kiya..... galti meri thi manta hun..pr abb sb 6 mahine phle khattam ho gaya tha to wo abhi bhi wahi ratt lagay hai....mere se kuch kehne wali wo hoti kun hai... aur phir pith piche humko hi kos rahi.... aissa kyu tha bhai ki sb humko hi sunna k ja rahe...
Gm.... taau gadha hai na tu..... chal tu humko suna le... hum sun rahe bol de aaj sb..
Pm... thanks bhai.... yaar mtlb duniya mein hi sb se bura hun .. baki sareef.... baat karne gaya tha ...bawal huwa chal.... magar y dogli rajneeti kyu akhir. .. humse kuch aur hamare peeth piche kuch aur... chal kya raha uske mnn mein... mein hi chutiya tha usski itni suni... abb kaisse kahe ki jo kar raha hun uski wajah wo nahi... phir bhi mere ko aake suna rahi.... usko beech mein bolne ko bola kun.bhai puri suniya mein humko hi badnaam karna hai baki sb doodh k dhule hai..to y umeed kyu ki uski baat abb maanu.. faltu hai wo... aaj bhi jo yaad aati hai wo 8 saal phle ki kahani thi baki to yahan wali abb yaad bhi nahi aati.....

Pm....bhai aab to log humko nukar bhi nahi banayenge.. aur hamare liy unk pass wqt nahi ki wo hamara murder kar sake... piddi k launde aur baate pahad type..... abb itte bure din bhi na aay hai ki jisko khud khane k lale ho wo humko nukar rakgenge.....
Gm.... bhai keh to tu sahi raha hai bol abb kya...
Pm.... kuch na yaara ..... hum kl bhi wahi the jo aaj hai aur kl bhi wahi rahenge. ...bss yaar samjh na araha ki y bawal akhir hai kyu...
Gm.... samjh to mere bhi nahi araha ...
Pm.... has le kake... has le...
Gm.... to bol abb kya karu...
Pm... chal kahin ghoom k aate hai...
Gm.... chal chai pee k aate hai..
Pm... chal
Gm.... ek baat bolu bhai.... in sab mein kuch nahi rakha hai... sahi galat ki behas to har baat pe ho sakti hai..enjoy kake enjoy..

chapter 1


Chapter 7 Screaming ecos of silence

diary pages of pm......
Kuch din phle jo meine kiya uska explanation de raha hun.. galti koi or kare saja kissi aur ko mille y galat baat hai.. abb jo naya ghatnakram samne aya hai uske mutabik humare priy mitra pr y arop lag raha hai ki y ussne kiya... arre mohtarma y batao ki phone kar k humse kya kaha tha tumne?or jb baat bigadegi to tumko call karungi ajana..? Kyu bhai tb kyu aay .. sala sari galti jb mere hi sir madhni thi to y bata tere favour mein y baat jaati to thik na jati to mere ko samne kar deti... yahi plaan tha na tera... kyu karu jo tune kaha....sala harmkhor ko pitna hi tha mere hatho aaj nahi to kl.... abhi to jo kiya wo uth k muh mein jeera barabar hai....mere kissi bhi dost per iljam lagane se phle y sb jaan le.. abhi hum jinda hai... bakaiti aur himakat jab jaruri ho karni hi padti hai...aor jo tere sath hona chahiy wahi hoga abb.. Sala y bhi chahiy .wo byi nahi khona ... sati savitri bani rehna... duniya ki nazar mein apni image banana. .. dusre ki jira kar.... kyunki samne wala to explanation dega nahi kissi ko.... y jiri hui harkat teri hai.... sala samjh nahi araha tere aur vandana k beech ke majak mein mein kahan se jhus gaya .... ghusa to apne tk rakhni thi baat... jb nein wahan tha hi nahi.... mere se kya matlb tha... bola tha na ek din phle ki kutta bol lo uss mental k sath naam na jod.... samjh nahi ata kya ek baar mein.... agar kuch plan kar k kiya na .. to sala koi nahi ki phir humse bach jay.... bola tha na ki char din se lm ja rahe... tere ko chul thi sath chalne ko hamare sath... humko nahi...humare sath baki sab arahe the.... aur khud janti jo pura hostel chal raha ...last time unka plan change ho haya y hamara lan lagta hai....gali khane wali kharkate na kar... ladkiyo ki bahut Ijjat karta hun per teri jaissi nahi dekhi.......REST WILL BE CONTINUE SOON

chapter 1 : jackals of life


There is only one problem in reality that it is not fictional but a "fact" and people quite often don't understand, may be because they see things in a way which may be true or false but others has right to ignore or subside their views as might have different views, never ever try to pull a string too hard to hinder its sweet sound into unpleasant one,Learning fast and learning true the chapters of life with special effects are still on, only thing is i am trying to nice with people giving A punctuation mark (,) ''quama'' then a previous version full stop.

Friday, July 28, 2017

Dusk of Dawn : Story under tale

Whole life now becoming the mess of missed shot opportunities and somehow the ignored ideas are creating discomfort of feel and actions my social nature has just dropped to the level there.When i try to look into my own life ,i can say i had dark and bright side both as we all do ,matters what which side has more reflections on society .my faith, determination and what i consider is working with me along the passage of time is now so mixed and jumbled that for now my whole life has only one remain of side 'GREY'. Now days establishing a connection between mind and heart is so difficult because the only rule existing in the society is "SURVIVAL OF THE FITTEST" either you fit-in or you will be out by a hit. no matters what you deserve until you don't achieve it , disrespect hatred and selfishness so common that even i dout my own explanations to situation mostly because this is what you get when you trust out of your instincts . love to have my little world seldom to interact with others as this real world is more to offer than you think off.great heroes are those who really can find way out in a emptiness of solitude.